सोमवार, सितंबर 14, 2026

कुछ टूट जाता है

कुछ टूट जाता है अंदर से

रोज़ जब हम जिंदगी से लड़ते हुए

अपनों के दो पल खोजते हैं

और खाली हाथ रह जाते हैं


बचपन के स्टेशन से निकली रेल

जाने कितने ठिकानों से गुजरती है

खिड़की से बाहर धरती दौड़ती से लगती है

मगर अपनी जगह पर हम वहीं ठहरे रहते हैं

जहां से चलते हैं, अकेले से, खोये हुए


बहुत से साथ चढ़े हुए लोग

एक एक कर उतरते जाते हैं 

और आते हैं अजनबी, 

सामने की सीट पर, बग़ल के कूपे में,


और आप बांटते हो कुछ कहकहे

कुछ बातें, कुछ अपने को, थोड़ा थोड़ा

सबको थमाते जाते हो, इस उम्मीद में 

कि वो भी अपना थोड़ा सा आपके पास छोड़ेंगे


मगर सब उतर जाते हैं, अपनी मंज़िल पर,

अपना सामान समेट कर, ध्यान से

कुछ पीछे तो नहीं छूट गया, और आप

एक झूठी मुस्कान से उनको बिदा कर देते हो


आपकी मंज़िल नहीं आती, रात आती है

सुबह आती है, और फिर आता है वो चायवाला

पनीली सी उस चाय के प्याली में 

आप फिर अगले दिन का स्वाद खोजते हैं

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