शनिवार, अक्तूबर 20, 2012

सबब

क्यों हर सुबह तुम्हारी याद आ जाती है,
क्यों हर सहर तुम्हारी खुशबू बिखरा जाती है.

मैं जानता ही नहीं क्यों तुम्हारा नाम मेरी मुस्कुराहट बन गया है,
मैं जानता ही नहीं क्यों तुम्हारा होना मेरे होने का सबब बन गया है.

गुरुवार, अक्तूबर 06, 2011

स्टीव जॉब्स की स्मृति में


हे स्वप्नदर्शी,
तुम कहां चल दिये,
उड़ कर,
बिना कुछ कहे.

कहीं ये दिन का अंत तो नहीं,
या तुम्हारा प्रयाण है,
नई सुबह के आगमन से पहले,
विश्राम का समय.

तुमने, आकार दिया,
स्वप्न को जो हम सबने देखा,
रंग दिया, तस्वीर को,
जो कहीं हमारे दिल में छुपी थी,
पंख दिये, आकाश दिया,

स्वप्नदर्शी,
तुम हमारे साथ हो,
तुम्हारी आंखों से ही देखेंगे,
हम रंगों भरी कल की सुबह,
तुम्हें नमन.

रविवार, मई 08, 2011

आज फिर सहर एक शाम लाई है

ये कैसी सहर हुई है आज, कि हर ओर सांझ नज़र आती है,
तन्हा गलियों में पसरी सी पगलाई ये सियाही नज़र आती है.

कल रात सोचा था रोशनी का इंतज़ार करेंगे,
छिटक कर दूर हर बुरे ख्वाब को,
मेहबूबो यार का फिर एहतराम करेंगे.

मगर ये क्या हुआ कि,
आज फिर सूरज रूठ गया,
अपनी रोशनी को समेट,
आज मेरे साये को भी जुदा कर गया.

मुझे तो चलना है आज भी,
सियाह गलियों में,
खस्ता हाल फुटपाथों के पत्थरों को उछालते हुए,
सुना है,
इस गली के मोड़ से जो रास्ता जाता है,
वो रोशनी के चौराहों पर जा मिलता है.

बुधवार, अगस्त 19, 2009

सूरज - बाल कविता - २

मुझसे धरती, मुझसे चंदा,
मुझसे सारी सृष्टि,
मुझसे जल, मुझसे नभ,
सब पर मेरी दृष्टि,
मुझसे सारा जीवन है,
मुझसे सारी खुशियां,
मैं सूरज हूं, मेरे पीछे,
दौड़ रही हैं सदियां

सूरज - बाल कविता


सुबह रोज मैं आता हूं,
तुम सबको दौड़ाता हूं,
शाम को फिर मैं छुप जाऊं,
चंदा को आवाज लगाऊं,
मेरे प्यारे चलते रहना,
सपने सुंदर वुनते रहना.

शनिवार, जुलाई 25, 2009

सुबह

हर सुबह है लाती,
खुशियों की एक पाती,
प्रकृति जगाती मन को,
एक नई खोज पर बुलाती.

आओ नमन करें ईश का,
शीश झुकाकर आभार करें,
तुमने दी ये अनोखी धरा,
तुमने दिया ये सुंदर जीवन.

मंगलवार, अप्रैल 21, 2009

मंज़िल

मंजिल उन्हीं को मिलती है,
जिनके सपनो में जान होती है
पंखों से कुछ नहीं होता,
हौसलों से उड़ान होती है

सोमवार, अप्रैल 20, 2009

दर्द

दर्द कोई हमदम तो नहीं,
कि गुज़रते वक्त पे छोड़ दूं,
वो तो मेरा साया है,
वो कब्र तक साथ जायेगा.