मंगलवार, सितंबर 07, 2004

बातें, कही अनकही

बातें, कही अनकही
पड़ी रह जाती हैं ।

जैसे सुबह की नर्म दूब पर पड़ी
ओस की बूंदें ।

जब कभी पाँव पड़ जाये
तो गुदगुदी सी होती है ।

या फिर डायरी के पन्नों पर पड़े
स्याही के कुछ छींटे ।

पीले पड़ते पन्नों पर,
चमक कभी नहीं जाती ।

बातें,
बस वही तो रह जाती हैं ।

- आनन्द जैन

5 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

बातें, कही अनकही
पड़ी रह जाती हैं ।

जैसे सुबह की नर्म दूब पर पड़ी
ओस की बूंदें ।

जब कभी पाँव पड़ जाये
तो गुदगुदी सी होती है ।

या फिर डायरी के पन्नों पर पड़े
स्याही के कुछ छींटे ।

पीले पड़ते पन्नों पर,
चमक कभी नहीं जाती ।

बातें,
बस वही तो रह जाती हैं ।

बेनामी ने कहा…

how do u write it in devnagri script?

Manoj Jha ने कहा…

आज पहली ‍बार आप के चिठे पर आ का और हि*दी में टाइप कर अछा लगा है।

बेनामी ने कहा…

vah vah kya baat hai

talent ने कहा…

baatein bhul jati hain....yaadein yaad aati hain...