शुक्रवार, सितंबर 17, 2004

रिश्ते

रिश्ते,
जो तैयार होते हैं,
संबोधन की नींव से,
सामीप्य की दीवारों से ।

हर साथ बिताया पल,
एक उस ईंट की तरह,
जो इमारत की बुनियाद बनती है ।

फिर साथ रहते हुए,
हम इन्हें संभालने की कोशिश करते हैं ।
ये बंट जाते हैं छोटे छोटे बक्सों में,
हरेक अपने प्रकोष्ठ में बंद ।

प्रकोष्ठ,
जिसका एक ही दरवाजा होता है,
भीतर बाहर जाने के लिए ।

रिश्ते जो भवन नजर आते हैं बाहर से,
किंतु भीतर से होते हैं रीते बक्से ।
आओ हम तुम कोशिश करें,
इन बक्सों से बाहर रहने की ।

वह मंजिल तैयार करें,
जहां कोई दीवार न हो.
न प्रकोष्ठ, न दरवाजा,
ताकि किसी रिश्ते के लिए
फिर सांकल न बजानी पड़े ।।

7 टिप्‍पणियां:

Mahavir Sharma ने कहा…

श्री कालिदास जी
आपकी यह कविता बहुत ही अच्छी लगी। अन्तिम पद बहुत ही प्रभावशाली हैः-
वह मंजिल तैयार करें,
जहां कोई दीवार न हो.
न प्रकोष्ठ, न दरवाजा,
ताकि किसी रिश्ते के लिए
फिर सांकल न बजानी पड़े ।।
आप कभी मेरे ब्लॉग का भी आलोकन कीजियेः
mpsharma.com/mahavir
महावीर शर्मा

Vijay Thakur ने कहा…

अगली रचना के लिए सांकल बजानी पड़ेगी?

डॉ॰ व्योम ने कहा…

aapki kvitaon main gahrji hai badhai/

डॉ॰ व्योम ने कहा…

Kavitayin bhut prabhawshali hain. dr.vyom

Ashutosh ने कहा…

ये कविता पढने के बाद ओशो कि कुछ पंक्तिया याद आ गयी (अनुवाद में कही भाव ना बदल जाये , इस लिए ज्यो के त्यों उदृत कर रह हू ) - Relationship is ugly, relating is beautiful.

- आशुतोष

talent ने कहा…

gazab...

Travis Smith ने कहा…


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